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भटकाव

 


एक सिसकता हुआ मौन है

एक दिशाहीन दौड़

और एक भ्रम है जो वास्तविक सा लगता है।


जीवन-मरण के प्रश्नों में उलझा हुआ मैं

मोक्ष की तलाश में भटक गया हूँ।


प्रश्नों के उत्तर में प्रश्नों का दोहराव है

नींद में स्वप्नों का खलल

और यात्रा में शताब्दियों की एक ऊब।


सूक्तियों और उपदेशों के त्रासद समय में

मैं किताबों के कुपाठ करके

मुक्ति का मार्ग तलाशता हूँ।


अतीत के तहखानों में कैद

और गर्व के बोझ से दबा हुआ मेरा वर्तमान

भविष्य का रास्ता भूल गया है।


मुझे वर्तमान में एक पड़ाव चाहिए

प्रश्नरहित एक क्षण

और एक शीतल छांव

कि जहां कुछ देर सुस्ताकर

मैं इस आदिम भटकाव को विराम दे दूँ।


-अशोक कुमार


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