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दर्द....

 



किसके हिस्से दर्द न आता?
लाख छुपाओ,फिर भी रिसता

तन को भले वसन ढँकता
दर्द तो दिल के कोने छुपता

सुख से तो आनन मुस्काता
दुःख तो आँखे कोरों रिसता

नर्म,गर्म सा खारे पानी सा
ओस से भी कड़ी मोती सा

आँखे भरी होती वेदना से
तब भी ढुलकने से वो शर्माता

कोई जो अपना दिख जाता
फूटता प्रवाह झरता मोती

विरहन के अंजन से घुलकर
कपोलों पर रेख है खींचता

सुख की एक झीनी चादर
धूल जाता नैनन के नीर से

लाख छुपाने से न छुपता
दमक उठता मन का दर्प।।

Written by Usha Kumari


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