मैं जितना देह में था उतना ही देह से बाहर रहा जुलूसों में कुचला नारों में उछला झंडों में फड़फड़ाया और अंत में बीड़ी के धुयें में धुंआ होकर छाती ...Read More
नहीं लिख सकता मैं हर बात पर कविता कुछ बातों पर मुझे झुंझलाना आता है कुछ पर गुस्सा कुछ पर मैं रो पड़ता हूँ और कुछ पर चुप ही रह जाना आता है कु...Read More